• suresh posted an update 1 year ago

    वैज्ञानिक का विश्वास ””——

    घटना 1914 के दिसंबर की है। तब अमेरिका के प्रसिद्ध वैज्ञानिक थॉमस अल्वा एडिसन की उम्र 67 साल हो चुकी थी। उनका जीवन मुश्किलों से घिरा हुआ था। उन्हें बिजनेस में घाटा हुआ। पहली पत्नी से तलाक हो गया। वह बेहद आर्थिक तंगी में जी रहे थे। लेकिन तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद वह एक युवा की तरह पूरे जोश और उमंग के साथ अपनी प्रयोगशाला में जुटे रहते थे। अपने काम के प्रति उनका विश्वास अटूट था। उन्हें यकीन था कि वह सही दिशा में जा रहे हैं।

    एक दिन शाम को वह अपने काम में मशगूल थे कि उन्होंने पाया कि खिड़की के बाहर धुआं उठ रहा है। पहले तो उन्हें लगा कि कहीं दूर आग लगी है पर जब उन्होंने बाहर झांका तो पाया कि उनकी फैक्ट्रीनुमा प्रयोगशाला में आग लग गई है। दिसंबर की उस शाम एडिसन की जिंदगी भर की मेहनत धू-धू कर जल रही थी, लेकिन वह यह सब शांतिपूर्वक देख रहे थे। आग इतनी ज्यादा भड़क चुकी थी कि अब कोई भी उपाय करना संभव नहीं रह गया था।

    अपने बेटे चार्ल्स को देखते ही एडिसन चिल्लाए, ’चार्ल्स, चार्ल्स तुम्हारी मां कहां है? जाओ उन्हें ढूंढ कर यहां ले आओ। तुम्हारी मां ने जीवन में ऐसा नजारा नहीं देखा होगा!’ जब उनकी पत्नी आई तो वह लपटों से अधिक एडिसन का चेहरा देख रही थी, जहां दुख और हताशा की कोई भी लकीर मौजूद नहीं थी। वह हतप्रभ थी। अगली सुबह तक आग की लपटें ठंढी हो गईं। अपनी प्रयोगशाला की खंडहर हो चुकी इमारत को निश्चिंत भाव से देखते हुए एडिसन बोले, ’ऐसी तबाही का भी बहुत महत्व है। इसमें हमारी सारी गलतियां जल कर खाक हो जाती हैं। भगवान का शुक्र है कि अब हम नई शुरुआत कर सकते हैं।’ इस भीषण अग्निकांड के तीन सप्ताह के बाद ही एडिसन ने फोनोग्राफ का आविष्कार कर दिखाया था।


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